केंद्र सरकार चाह तो रही है कि किसान नेताओं से बातचीत कर नए कृषि क़ानून पर बीच का कोई रास्ता निकल जाए. लेकिन, किसान नेता क़ानून वापस लेने की माँग पर अड़े हैं. अब तक छह दौर की बातचीत हो चुकी है. 

पहले सचिव स्तर की बातचीत हुई, फिर मंत्री स्तर की बातचीत हुई. फिर मंगलवार रात को सरकार में नंबर दो का दर्जा रखने वाले अमित शाह की एंट्री हुई. लेकिन किसानों को मनाने की कोशिशें अब तक सिफ़र ही साबित हुईं. 

पिछले शनिवार सूत्रों के हवाले से इस तरह की ख़बरें भी आई कि किसानों की बैठक से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वरिष्ठ मंत्रियों के साथ इस मुद्दे पर बैठक की है.

केंद्र सरकार ऐसी बातचीत से संकेत देने की कोशिश कर रही है कि सरकार अपने रुख़ पर अड़ी नहीं है. बड़ा दिल दिखाते हुए उन्होंने किसानों की बात पर विचार किया और क़ानून में कुछ संशोधन के लिखित प्रस्ताव भी उन्हें बुधवार को भेजे हैं. किसानों ने सरकार के लिखित प्रस्ताव को ठुकरा दिया है.

साथ ही सरकार ये बात भी स्पष्ट तौर पर कह रही है कि नए कृषि क़ानून वापस नहीं लिए जाएँगे.

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर सरकार ये क़ानून वापस लेने को तैयार क्यों नहीं हैं? क्या इसके पीछे केवल राजनीतिक वजह है या फिर कुछ कृषि क्षेत्र के अर्थशास्त्र से भी जुड़ा है. क्या जिस तरह से कनाडा और ब्रिटेन में किसानों के समर्थन की आवाज़ें आ रहीं है, उसमें कोई अंतरराष्ट्रीय एंगल भी है.

यही जानने के लिए बीबीसी ने बात की कुछ पत्रकारों से और कृषि के जानकारों से.

‘बीजेपी इस वक़्त सत्ता में सबसे मज़बूत स्थिति में है, अभी नहीं तो कभी नहीं’

बीजेपी को सालों से कवर करने वाली वरिष्ठ पत्रकार निस्तुला हेब्बार कहती हैं, “सरकार का मानना है कि कृषि सुधार के लिए ये क़ानून ज़रूरी हैं. यही वजह है कि एनडीए ही नहीं यूपीए के कार्यकाल में इन सुधारों की बात की गई थी. शरद पवार की चिट्ठियों से ये बात ज़ाहिर भी होती है. लेकिन, किसी राजनीतिक पार्टी के पास ऐसा करने की ना तो इच्छा शक्ति थी और ना ही संसद में वो नंबर थे. बीजेपी केंद्र में 300 से ज़्यादा सीटों के साथ आई है. अगर कृषि सुधार वाले क़ानून अब लागू नहीं हुए तो कभी लागू नहीं होंगे.” 

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साख और नाक का सवाल

इससे पहले केंद्र सरकार संसद में भूमि अधिग्रहण बिल लेकर आई थी. उस पर उन्हें अपने पैर पीछे खींचने पड़े थे. उस वक़्त राहुल गांधी ने संसद में केंद्र सरकार के लिए ‘सूटबूट की सरकार’ का नारा दिया था. इससे सरकार की बड़ी किरकिरी हुई थी. इन क़ानूनों को प्रधानमंत्री से लेकर कृषि मंत्री तक अलग-अलग मंचों से बहुत क्रांतिकारी और किसानों के लिए हितकारी बता चुके हैं. इतना सब कुछ होने के बाद क़ानून वापस लेना सरकार की साख पर धब्बा लगने जैसा होगा. 

यहाँ एक बात और समझने वाली है कि भूमि सुधार क़ानून पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी केंद्र सरकार के साथ नहीं थी. लेकिन, इस बार आरएसएस से जुड़े किसान संगठन चाहे वो स्वदेशी जागरण मंच हो या फिर भारतीय किसान संघ इन क़ानूनों को किसान के हित में बता रहे हैं, लेकिन दो-तीन सुधार के साथ.

किसान आंदोलन: आरएसएस से जुड़े संगठनों को भी एमएसपी पर कोई बरगला रहा है? 

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‘विपक्षी दलों ने भी अपने कार्यकाल में इसकी माँग की थी, इसलिए क़ानून का विरोध राजनीतिक है’

केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दो दिन पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि कैसे कांग्रेस, एनसीपी और दूसरे दलों ने अपने-अपने दौर में इस तरह के क़ानून का समर्थन किया था. 

कांग्रेस का साल 2019 का घोषणा पत्र सुनाते हुए उन्होंने कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एपीएमसी एक्ट को ख़त्म करने का वादा किया था. शरद पवार की लिखी चिट्ठी बीजेपी के नेता लगातार ट्वीट भी कर रहे हैं. शरद पवार और कांग्रेस की तरफ़ से इस पर प्रतिक्रिया भी आई है.

उसी तरह से दिल्ली में जहाँ आम आदमी पार्टी की सरकार है, वहाँ तीन में से एक क़ानून लागू भी कर दिया गया है. और दूसरी तरफ़ दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल किसानों से मिलने और उन्हें समर्थन देने धरना स्थल पर पहुँच रहे हैं. 

इसलिए भी सरकार को लग रहा है कि केवल विरोध करने के लिए नए क़ानून का विरोध हो रहा है. 

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अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दिक़्क़तें 

पूरे मामले में एक अंतरराष्ट्रीय एंगल भी है. कृषि से जुड़े कई जानकारों को लगता है कि किसानों की एमएसपी पर क़ानून बनाने की माँग से भारत के कृषि क्षेत्र का भला नहीं होगा.

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मंच पर भारत अपनी फ़सलों की क़ीमतों का बेहतर मोलभाव नहीं कर पाता है. इसके पीछे की एक वजह भारत की एमएसपी व्यवस्था भी है.

प्रोफ़ेसर प्रमोद कुमार जोशी पूर्व में साउथ एशिया फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक रह चुके हैं. वो कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक़, कोई देश कृषि जीडीपी के 10 फ़ीसद तक ही किसानों को सब्सिडी दे सकता है. विश्व व्यापार संगठन में शामिल देशों ने ऐसा करने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है. 10 फ़ीसद से ज़्यादा सब्सिडी देने वाले देश पर आरोप लगते हैं कि वो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमतों को तोड़ मरोड़ रहे हैं. 

भारत सरकार जिन फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य देती है, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसे फ़सल पर दी गई सब्सिडी के तौर पर देखा जाता है. इसीलिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कई बार हमारी गेंहू-चावल की क़ीमतें दूसरे देशों से महंगी साबित होती है और हम अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में फ़सलें बेच नहीं पाते. 

कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की इस साल की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई फ़सलों की भारत की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से ज़्यादा है. 

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आउटलुक मैग़ज़ीन की राजनीतिक संपादक भावना विज अरोड़ा कहती हैं, “मेरी बीजेपी में कई नेताओं से इस बारे में बात हुई है. सरकार इस बात को मानती है कि ये सुधार ऐतिहासिक हैं. किसानों को आने वाले दिनों में पता चलेगा कि इससे कितना बड़ा फ़ायदा हुआ है और तब यही किसान उन्हें धन्यवाद देंगे. हर रिफॉर्म के पहले ऐसे आंदोलन होते हैं. लेकिन, सरकार भी इस बार लंबी लड़ाई के लिए तैयार है.” 

भावना आगे ये भी कहती हैं कि सरकार जिन संशोधनों पर राज़ी होती दिख रही है, इससे एक बात साफ़ है कि सरकार ने अपना स्टैंड पहले के मुक़ाबले काफ़ी लचीला किया है. लेकिन, भविष्य में सरकार कब तक क़ानून वापस ना लेने की माँग पर क़ायम रह पाती है, ये भी देखने वाली बात होगी.

केंद्र सरकार ने साल 2022 में किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया है. उन्हें लगता है ये क़ानून उस वादे को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

Source – BBC

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