सफलता का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता. कामयाब होने के लिए जीतोड़ मेहनत लगती है. जो लोग बिना किसी की परवाह किए पूरी लगन से मेहनत करते हैं, कामयाबी उनके कदम चूमती है. तमिलनाडु की राजधानी केलकट्टलाई के रहने वाले पी बालमुरुगन ने इसे साबित किया है. बालमुरुगन की मां ने बच्चों का लालन-पालन करने के लिए अपने सभी गहने बेचे. खुद बालमुरुगन मां की मदद करने और पढ़ाई जारी रखने के लिए अखबार बेचा करते थे. ऐसी परिस्थिति के बीच पढ़ाई करते हुए बालमुरुगन ने यूपीएससी की परीक्षा पास की और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस में शामिल हुए. उनकी सफलता की कहानी वाकई प्रेरणा देने वाली है. पी बालमुरुगन ने 2018 में यूपीएससी की परीक्षा पास की. 2019 में बतौर आईएफएस ऑफिसर पहली पोस्टिंग मिली. इस वक्त बालमुरुगन राजस्थान के डूंगरपुर वन विभाग में अधिकारी हैं.

कभी किसी चीज को अचीव करना होता है तो उसके लिए लगती है मेहनत, कई रातों की नींद। सुकून को छोड़कर जागना पड़ता है। वो करना पड़ता है जो कभी ना किया हो, ना ही उसकी उम्मीद की हो। पर दिल से किया हर काम एक सीढ़ी की तरह से इंसान को मंजिल तक पहुंचाता है। मेहनत उसकी सबसे पहली सीढ़ी है। एक ऐसी ही कहानी सामने आई है। एक आईएफएस ऑफिसर हैं, जिनकी यात्रा तमाम मुश्किलों से निकली लेकिन आज ऐसे मुकाम पर पहुंच गई, जहां लोग उनसे सीख रहे हैं।

चेन्नई के रहने वाले हैं वो
P Balamurugan वो मूलरूप से Keelkattalai जोकि चेन्नई में है, वहां के रहने वाले हैं। जब वो यंग थे। तो उन्होंने अपना परिवार का खर्च चलाने के लिए अखबार बांटे। उनके पिता उनकी मां को छोड़कर चले थे। उनके परिवार में मां और उनके 7 बहन-भाई थे।

मां को अपने गहने बेचने पड़े
उनकी मां को भी घर चलाने और अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। उनकी जमीन थी, पहले तो वो बिकी। फिर मां के गहने भी बिक गए। उनकी पांच बहनें, मां, मुरुगन खुद और उनका एक भाई सभी दो कमरों के घर में रहते थे। वो बताते हैं कि उनकी मां ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी लेकिन सोच उनकी बहुत बड़ी थी। वो ये ही चाहती थी कि उनके बच्चे पढ़े लिखें और अच्छी नौकरी हासिल करें।

आज वो आईएफएस ऑफिसर हैं
आज बालामुरुगन आईएफएस ऑफिसर हैं। वो Dungarpur Forest Division जोकि राजस्थान में है वहां नौकरी कर रहे हैं। वो बताते हैं कि एक दफा उन्होंने अखबार पढ़ने के लिए न्यूज वेंडर से पूछा, तो उसने बताया कि 90 रुपये महीना खर्च करने होंगे। इसके बाद उन्होंने उसे बताया कि उनके पास पैसे नहीं हैं तो न्यूजपेपर वेंडर ने उन्हें जॉब दे दी। इसके लिए उन्हें 300 रुपये मिलते थे। वो कहते हैं कि उनके परिवार को कई बार ऐसे दिन झेलने पड़े, जब वो खाने के बिना सो जाते थे। लेकिन कभी पढ़ाई किए बिना नहीं सोए।

‘मां के कारण ही हूं यहां’
साल 2011 में उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। उन्हें टीसीएस में जॉब मिल गई। इसी बीच उनकी जमीन पर किसी राजनीति से प्रभावित शख्सियत ने कब्जा करने की सोची। इससे उनका घर भी चला जाता। महज 10 फीट जमीन रह जाती। इसी बीच एक लेडी आईएएस ऑफिसर ने उनकी मदद की। उन्होंने शिकायत दर्ज करवाई। उसपर काम हुआ। इसी दिन उन्हें ये पता चल गया था किए गुड गवर्नेंस कितना जरूरी है।

विदेश जाने का मौका मिला
हालांकि इसके बाद उन्हें विदेश जाने का मौका मिला, लेकिन वो सिविल सर्विस का मन बना चुके थे। लिहाजा उन्होंने विदेश जाकर काम करके कुछ रकम जुटाने का सोचा। फिर कुछ वर्षों बाद अपनी सेविंग्स के साथ वो इंडिया वापस आए। उन्होंने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी।

नहीं कर पाए जब क्लियर
तीन वर्षों तक वो ये क्लियर नहीं कर पाए। पर उन्होंने मेहनत करना नहीं छोड़ा। साल 2018 में उन्होंने एग्जाम दिया और क्लियर हो गया। साल 2019 में वो आईएफएस कैडर के तहत भर्ती हुए। बाला की कहानी में एक दर्द है। उनके पिता मां को अकेला छोड़ गए। बचपन कैसे-कैसे कटा लेकिन उन्होंने बता दिया कि कोशिश करने वाले हार शब्द को उखाड़ फेंकते हैं।

Source – daily Bihar

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