22 दिसंबर को पटना दुल्हन की तरह सजाई गई थी कारण था अपनी शाही यात्रा के तहत प्रिंस ऑफ वेल्स पटना पहुंच रहें थे। यह किस्सा सन 1921 का है। 22 दिसंबर को सबसे पहले इसलिए बताया क्योंकि इसी दिन 22 दिसंबर 2020 को रात के समय हमारे साथ पीएमसीएच के अंदर सुरक्षाकर्मियों द्वारा मारपीट की गई और सबसे बड़ा संयोग देखिए की पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का नाम इसी प्रिंस ऑफ वेल्स के नाम पर रखा गया था।

PMCH यानी कि पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का पुराना नाम प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज हुआ करता था। आज की खबर में हम पीएमसीएच के पुराने गौरवशाली इतिहास पर बात करेंगे और आपको बताएंगे कि कभी पूरे भारत का गौरव होने वाला पीएमसीएच आज कैसे खुद के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

कहा जाता है कि आजादी के पहले अंग्रेजी सरकार हम पर जुल्म करती थी लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि कुछ अच्छी चीजें भी थी जिसे तब की अंग्रेजी सरकार ने हमे दिया था लेकिन आज की हमारी अपनी सरकार उसे संभाल नहीं पा रही है। ध्यान रखिएगा यहां मैं सिर्फ अपनी सरकार के असफलता पर बोल रहा हूं ना कि अंग्रेजी सरकार का गुणगान कर रहा हूं। 

वैसे 1925 में PMCH को आधिकारिक तौर पर स्थापित किया गया था लेकिन इसके पहले से ही इस हॉस्पिटल का अपना इतिहास रहा है। सबसे पहले आपको बता दूँ की पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का नाम शुरुआत में प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज हुआ करता था। इसके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है। ब्रिटिश साम्राज्य के किंग जॉर्ज पंचम के बेटे प्रिंस ऑफ वेल्स अक्टूबर 1921 से लेकर मार्च 1922 तक भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा पर आए थे। सन 1921 के 22 दिसंबर को सुबह-सुबह नेपाल से ट्रेन और स्टीमर की यात्रा करते हुए प्रिंस ऑफ वेल्स एडवर्ड पटना पहुँचे थे। पटना के आयुक्त घाट पर प्रिंस का भव्य स्वागत किया गया। उसके बाद प्रिंस एडवर्ड को बांकीपुर मैदान ले जाया गया और वहां उनके सम्मान में भव्य स्वागत समारोह रखा गया था।

बांकीपुर मैदान का नाम सुनकर शायद आप थोड़ी हैरानी में पड़ गए होंगे इसलिए आपको बता दूं की जिसे आज के समय में गांधी मैदान के नाम से जाना जाता है उसका नाम उस समय बांकीपुर मैदान हुआ करता था। उन्हें गवर्नमेंट हॉउस में ठहराया गया था। एडवर्ड ने इस यात्रा के दौरान बिहार और उड़ीसा प्रांत के कुछ चुनिंदा मेहमानों से भी मिले थे।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि बिहार और उड़ीसा उस समय बंगाल प्रांत यानी कि बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग हो चुके थे। उनकी इस यात्रा के 4 साल बाद बिहार और उड़ीसा के पहले मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। 1925 में जब इस मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई तब प्रिंस ऑफ वेल्स के सम्मान में इसका नाम ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ मेडिकल कॉलेज’ रखा गया था। कहा जाता है कि इसकी स्थापना के 2 साल बाद 1921 में प्रिंस की हुई शाही यात्रा की याद में आधिकारिक तौर पर उद्घाटन हुआ था। जब इस मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई थी, उस समय उत्तर प्रदेश बिहार और उड़ीसा के साथ-साथ आस-पास के अन्य प्रांतों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण था।

आजादी के पहले इस मेडिकल कॉलेज की गिनती भारत के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में की जाती थी लेकिन आज के समय में यह स्थिति एकदम इसके उलट हो चुकी है। आज के दौर में पीएमसीएच को भारत के सबसे खराब व्यवस्था वाले हॉस्पिटलों की लिस्ट में रखा जाए तो किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। बताया जाता है कि पहले इस मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और नेपाल के साथ-साथ आसपास के कई अन्य देशों से भी मरीज आते थे लेकिन आज के समय में यह मेडिकल कॉलेज इस दुर्दशा में पहुंच चुका है कि अपने राज्य के मरीजों को संभालने में भी नाकाम है।

कभी इसी मेडिकल कॉलेज से पढ़ने वाले डॉक्टर बी.सी रॉय को भारत रत्न से नवाजा गया था लेकिन आज कुव्यवस्था की शिकार हो चुके इस मेडिकल के बारे में कोई सच्चाई पता लगाने भी जाता है तो वहां मौजूद भाड़े के गुंडों द्वारा उन्हें पीटा जाता है। मैं उन सारे सुरक्षाकर्मियों को भाड़े का गुंडा इसीलिए बोल रहा हूं क्योंकी अगर वे वाकई में सुरक्षाकर्मी थे तो उन्हें हमारी सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता ना कि किसी पत्रकार को पीटने के लिए।

2018 के नवंबर में नीतीश कुमार जी ने सपना दिखाया था कि अब पटना चिकित्सा महाविद्यालय यानी कि पीएमसीएच दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल बन जाएगा। सर दुनिया का छोड़िए सबसे पहले PMCH को इस लायक बनाइये की अगर कोई पत्रकार वहां जाकर शूट करना चाहे तो आपके गुंडों को उन्हें पिट कर भगाना ना पड़े। पीएमसीएच को इस लायक बनाइए कि अगर कोई वहां के टॉयलेट में घुसे तो बिना उल्टी कीजिए बाहर निकल जाए। सर 2018 के नवंबर में 5 हजार 540.07 करोड़ रुपए का ऐलान किया गया था लेकिन आज 2 साल से ज़्यादा हो गया और पटना मेडिकल मेडिकल कॉलेज उसी हालत में है।

पटना मेडिकल कॉलेज की हालत इतनी खराब है किसी लड़के को उसके बाप की लाश को रखने के लिए भी जगह नहीं मिल पाता है। उस लाश को ऐसे ही पीएमसीएच के किसी कोने में फर्श पर फेंक दिया जाता है। बाकी हम तो पत्रकार हैं, अगर हम यह सब बोलेंगे और दिखाएंगे तो हमें सडक़ो पर दौड़ा के पीटा जाएगा।

Source – Janta Junction

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