RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आज 3 साल बाद बिहार लौट रहे हैं। उन्होंने इसे लेकर दिल्ली AIIMS में उनके डॉ. राकेश से अनुमति ली। उनके साथ पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती भी पटना आएंगी। लालू यादव के पटना आने के बाद यही दोनों उनकी सेहत का ख्याल रखेंगी। हालांकि, डॉक्टरों ने लालू को ज्यादा लोगों के संपर्क में नहीं आने की सलाह दी है।

उनके बिहार आने पर आज हम उनसे जुड़ी कुछ रोचक कहानियां लेकर आए हैं। जानते हैं कैसे लालू प्रसाद यादव, बिहार की राजनीति में इतने बड़े नाम हुए।

लालू यादव का जनता से जुड़ाव गजब था। गरीब-गुरबे तो भैंस की पीठ पर बैठकर भी उनकी बात सुनते थे। फोटो - राजीव कांत
लालू यादव का जनता से जुड़ाव गजब था। गरीब-गुरबे तो भैंस की पीठ पर बैठकर भी उनकी बात सुनते थे। फोटो – राजीव कांत

मंच से रहा है बचपन से नाता
गोपालगंज के फुलवारिया में लालू का जन्म हुआ। उनके पिता कुंदन राय दूध बेचते थे। लालू भी बचपन में मां मरिछिया देवी के साथ घर-घर जाकर दूध बांटा करते थे। गांव में ज्यादा कुछ था नहीं, तो 1966 में शहर पढ़ने चले गए, बड़े भैया के पास।

भैया पटना के बिहार वेटरनरी कॉलेज में चपरासी थे। कॉलेज के ही सर्वेंट क्वॉर्टर में रहते थे। यहीं से लालू 10 A नंबर की बस पकड़कर बीए की पढ़ाई करने बिहार नेशनल कॉलेज (BN College) जाते थे। जहां पर उनकी राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई।

लालू अक्सर मंच पर चढ़कर भाषण देते। हालांकि, मंच उनके लिए नया नहीं था। बचपन में लालू ‘नटुआ’ बनकर मंच पर खूब धमाल मचाते थे। नटुआ मतलब वो लड़का जो लड़की के वेश बदलकर नाचता-गाता हो। यानी लालू को लोगों को मोहने का तरीका बचपन से ही आता था। कॉलेज में छात्र उन्हें सुनना पसंद करते थे। अगले साल ही लालू पटना यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट यूनियन के जनरल सेक्रेटरी बन गए।

ये तस्वीर तब की है जब लालू यादव, नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर रहे थे।
ये तस्वीर तब की है जब लालू यादव, नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर रहे थे।

छात्र राजनीति में मिली हार, पर हार नहीं मानी
1970 में लालू का ग्रेजुएशन पूरा हो गया। लेकिन, लालू स्टुडेंट यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए। लालू ने इसके बाद भैया के ऑफिस में ही (बिहार वेटरनरी कॉलेज) में डेली वेज बेसिस पर चपरासी की नौकरी कर ली। 3 साल तक वह हालांकि छात्र राजनीति से जुड़े रहे और दोबारा कानून की पढ़ाई के लिए पटना यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया। 1973 में लालू प्रसाद यादव पटना यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट बन गए। छात्र राजनीति में लालू बिल्कुल सही समय पर लौटे थे।

1974 में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन की घोषणा कर दी। यह दौर उनके जीवन का सबसे अहम दौर साबित हुआ। लालू आंदोलन में शामिल हो गए। छात्र राजनीति में पकड़ रखने वाले लालू जेपी की पसंद बन गए। हालांकि, कई लोगों का कहना है कि एक बार जेपी को बचाने के लिए लालू बुरी तरह जख्मी भी हो गए थे।

ये तस्वीर आपातकाल के बाद की है। जॉर्ज फर्नांडिस और लालू प्रसाद एक साथ दिखे।
ये तस्वीर आपातकाल के बाद की है। जॉर्ज फर्नांडिस और लालू प्रसाद एक साथ दिखे।

लालू आपातकाल के बाद बने सबसे कम उम्र के सांसद
जेपी के खास होने की वजह से आपातकाल की घोषणा के बाद लालू पुलिस की राडार पर आ गए। पुलिस उन्हें खोजते हुए उनकी ससुराल तक पहुंचने लगी। एक बार जब लालू को पुलिस पकड़ने पहुंची तो लालू पुलिस जीप पर चढ़ गए। कुर्ता फाड़ कर जोर-जोर से चीखने लगे। उनके बदन पर पुलिस के डंडों के निशान बने थे। कहते हैं देखने वालों के दिमाग में ये दृश्य छप गया। आपातकाल के बाद 1977 में लोकसभा का चुनाव हुआ। लालू को जनता पार्टी की ओर से छपरा से टिकट मिला। लालू जीत गए और इतिहास रच दिया।

29 साल की उम्र में संसद पहुंचने वाले लालू उस वक्त तक देश के सबसे युवा सांसद थे। पार्टी के अंदर भी उनका कद बढ़ता रहा। जेपी ने लालू को स्टूडेंट्स एक्शन कमेटी का मेंबर बनाया। इसी कमेटी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए टिकट तय करने थे। कहते हैं इसके बाद बड़े-बड़े नेता टिकट के लिए पटना वेटरनरी कॉलेज के सर्वेंट क्वॉर्टर के बाहर लाइन लगाते थे।

तस्वीर तब की है जब CM बनने के बाद पहली बार लालू गांव गए थे। फोटो - राजीव कांत
तस्वीर तब की है जब CM बनने के बाद पहली बार लालू गांव गए थे। फोटो – राजीव कांत

CM बनने के लिए करनी पड़ी कड़ी मशक्कत
जनता पार्टी की आंतिरक मतभेद के कारण सरकार गिर गई। इसी वजह से 1980 में फिर चुनाव हुए। लेकिन, इस बार लालू की सांसदी चली गई। हालांकि, उन्होंने उसी साल विधानसभा चुनाव में सोनपुर से लोक दल के टिकट पर विधायकी का पर्चा भरा और जीत गए। 1985 में लालू ने फिर विधानसभा का चुनाव जीता। बात फरवरी 1988 की है। बिहार के पूर्व CM कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया। तब कड़ी मशक्कत के बाद लालू प्रसाद को विपक्ष का नेता बना दिया गया। 1990 के चुनाव में जनता दल ने वापसी कर ली। CPI के साथ सरकार बनाने लायक सीटें भी जुटा लीं। तब तक, CM किसे बनाया जाए ये समस्या खड़ी हो गई। केंद्र में जनता दल के PM वीपी सिंह राम सुंदर दास को CM बनाना चाहते थे।

वहीं, वीपी की सरकार में डिप्टी पीएम थे ताऊ देवी लाल। उनका जोर था कि लालू प्रसाद यादव को CM बनाया जाए। लालू 4 महीने पहले सांसदी का चुनाव लड़कर दिल्ली गए थे। तभी उन्होंने देवी लाल से घनिष्ठता बढ़ा ली थी। समस्या यही थी कि लालू ने विधानसभा चुनाव लड़ा भी नहीं था। विधायक दल की मीटिंग के पहले लालू ने चंद्रशेखर को मनाकर एक और कैंडिडेट रघुनाथ झा से CM पद पर दावा ठोंकवा दिया। विधायकों में वोटिंग हुई तो सवर्णों के वोट झा को मिले, रामसुंदर को हरिजनों के वोट मिले और लालू को पिछड़ी जाति के विधायकों के। वोटों के इस बंटवारे से लालू विधायक दल के नेता बन गए।

वहीं, चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह के इशारे पर राज्यपाल युनूस सलीम को लालू को शपथ दिलाने से बचने के लिए दिल्ली बुला लिया। लालू को जब यह पता चला तो वह सीधा उनके घर पहुंचे, पर वह निकल चुके थे। लालू ने फिर ताऊ देवी लाल को फोन किया। इसके बाद उन्हें शपथ दिलाई गई। 4 महीने बाद लालू CM हाउस में शिफ्ट हुए।

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