एमडीएच मसाले कंपनी की स्थापना करने वाले महाशय धर्मपाल गुलाटी का निधन हो गया है. वो 98 साल के थे.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार गुरुवार सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा था जिससे उनकी मौत हो गई. बीते तीन सप्ताह से वो अस्पताल में भर्ती थे. 

भारत में एमडीएच मसालों के विज्ञापनों और डिब्बों पर उनकी तस्वीर की वजह से उन्हें काफ़ी पहचान मिली थी.

एमडीएच मसाले कंपनी का नाम उनके पिता के काराबोर पर आधारित है. उनके पिता ‘महशियान दी हट्टी’ के नाम से मसालों का कारोबार करते थे. हालांकि लोग उन्हें ‘देगी मिर्च वाले’ के नाम से भी जानते थे.

उन्हें व्यापार और वाणिज्य के लिए साल 2019 में भारत के दूसरे उच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी नवाज़ा गया था.रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनकी मौत पर दुख प्रकट किया है और कहा है, “उन्होंने छोटे व्यवसाय से शुरू करने बावजूद उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई.”

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी उनकी मौत पर दुख जताया है और कहा है कि वो दूसरों को प्रेरणा देने वाले व्यक्तित्व के मालिक थे.

वहीं दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने उन्हें ‘प्रेरणा देने वाले कारोबारी’ कहा है.

रेल मंत्री पीयूष गोयल ट्वीट कर लिखा, “देश के मसालों की सुगंध को पूरे विश्व मे फैलाने वाले, पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित महाशय धर्मपाल गुलाटी जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ.”

धर्मपाल का जीवन सफर

महाशय धर्मपाल गुलाटी का जन्म साल 1923 में महाशय चुन्नीलाल गुलाटी और चन्नन देवी के घर सियालकोट में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है.

उन्होंने स्कूल की पढ़ाई तो शुरू की लेकिन पांचवीं का इम्तिहान वो नहीं दे पाए. साल 1933 में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और अपने पिता की मदद से नया कारोबार शुरू करने की कोशिश करने लगे. खुद अपनी आत्मकथा में वो कहते हैं कि उन्होंने ‘पौने पांच क्लास तक की’ ही पढ़ाई की है.

उन्होंने पिता की मदद से आईनों की दुकान खोली, फिर साबुन और फिर चावल का कारोबार किया. लेकिन इन कामों में मन नहीं लगने पर बाद में वो अपने पिता के मसालों के कारोबार में हाथ बंटाने लगे.

महाशय धर्मपाल गुलाटी

1947 को आज़ादी मिली और देश का विभाजन हुआ. धर्मपाल के माता-पिता ने पाकिस्तान छोड़ दिल्ली आने का फ़ैसला किया और 27 सितंबर 1947 में ये परिवार दिल्ली पहुंचा.

उस दौरान जो पैसे उनके पास थे उसे धर्मपाल ने एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तक और करोल बाग़ से बाड़ा हिंदू राव तक तांगा चलाने लगे.

जल्द ही करोल बाग़ में उन्होंने ‘महशियान दी हट्टी’ के नाम से ही फिर से अपना पुराना मसालों का कारोबार शुरू किया. वो सूखे मसाले खरीद कर उन्हें पीस कर बाज़ार में बेचते थे.

ये कारोबार अब पूरे देश-विदेश में फैल चुका है. 93 साल पुरानी ये कंपनी अब भारत के साथ-साथ यूरोप, जापान, अमेरिका, कनाडा और सऊदी अरब में अपने मसाले बेचती है. कंपनी का कारोबार 1500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का बताया जाता है.

उन्होंने अपनी मां के नाम पर दिल्ली में चन्नन देवी स्पेशलिटी हॉस्पिटल भी बनवाया.

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