लोग सवाल करते हैं की आखिर आज के मॉडर्न ज़माने में एक महिला को दिक्कत ही क्या है? अगर इस सवाल को वाजिब भी समझा जाए तो वो अपमान होगा, अपमान होगा हर महिला के संघर्ष का, अपमान होगा उन लाख छोटे बलिदानों का जो वो हर रोज़ देती है, अपमान होगा उस चुप्पी का जो कभी-कभी चुभती बहुत है मगर रिश्ते को बचाए रखने के खातिर एक महिला उस चुभन को बर्दाश्त कर लेती है, अपमान होगा उन आंसुओं को जो वो हम सब से छुपाती है क्योंकि रोती हुई औरत को कमज़ोर करार दिया जाता है, अपमान होगा उन रोटियों का जो वो खुद का पेट भरने से पहले हमें खिलाती है, अपमान होगा हर उस छोटी जंग का जो वो हर रोज जीत जाती है।

ये जंग कभी शाम को सड़कों पर, कभी किसी बस, कई एक बार उसके ऑफिस और कभी-कभी तो उसके घर की चार दीवारों के बीच ही होती है। अपनों से लड़ना जरा मुश्किल हो जाता है मगर फिर भी, इन दिनों वो आवाज़ उठाती है। 2 आंसू भले ही ज़्यादा बहा दे मगर वो जंग बेशक जीत जाती है।

आप पूछते हैं महिलाओं को आखिर दिक्कत क्या है। दिक्कत है आज भी समाज में पल रही वो दकियानूसी सोच जो उसे अपने काम को एक वैवाहिक जीवन से ऊपर रखने के लिए एक अपराधी जैसा महसूस कराती है, वो घटिया विचारधारा जो पति से पिटने के बाद भी उसे पत्नी धर्म का पालन करने का पाठ पढ़ाती है। दिक्कत है ये उग्रवादी समाज जो औरत के साथ होने वाले हर अन्याय के लिए बस उसके लिंग को जिम्मेदार ठहराता है, सदियों पुरानी सोच की बेड़ियों मैं जकड़ा समाज जो इतनी सी बात पचा नहीं पाता है की अपने लिए सही और गलत में फर्क कर सके, आज की औरत में इतनी समझ है। समस्या है ये दो चहरे वाला समाज जो चीख-चीख कर महिला सशक्तिकरण का नारा लगाता है लेकिन एक महिला का आदेश मान लेने से इनका लिंग खतरे में आ जाता है।

महिला को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने की बात ये जरूर करते हैं मगर एक महिला पुरुष से आगे न निकल जाए इसका भी ये खास ख्याल रखते हैं।

अगर आप वाकई एक महिला की दिक्कत समझना चाहते हैं तो एक बार उनकी दिन चरिया समझिए। शुरुआत हाउस वाइफ से करते हैं।

ये हर रोज उठती है, आपका घर चलाती है। हर किसी का पेट भर दें उसके बाद ही रोटी का निवाला अपने गले से उतारती हैं, साल के 365 दिन ये बिना थके काम करती रहती हैं। ना कोई सैलरी है, ना कोई प्रशंसा और न ही कोई छुट्टी का दिन लेकिन जो एक दिन ये कह दें की खाना बाहर से मंगवा लेते हैं आज तो पलट कर जवाब तुरंत आ जाता है, अरे यही तो एक काम है तुम्हारा इसके अलावा तुम करती क्या हो। करती वो ये हैं की बिस्तर की चादर से लेकर घर का राशन संभालती है, करती वो ये है की अपनी पसंद को त्याग कर पूरे परिवार की पसंद का ख्याल करती है। करती वो ये है की अपनी मां से मिलने जाने के लिए अपने बच्चों की छुट्टियों का इंतज़ार करती है, उसकी वजह से किसी को दिक्कत न हो जाए इसलिए अपनी छोटी बड़ी हर खुशी का चुपचाप त्याग करती है।

बात अगर कामकाजी औरतों की हो तो समस्या एक नहीं अनेक है। ये वो बेटियां, वो बहुएं हैं जो समाज के नजरिए में पहले ही हाथ से निकल चुकी है, ये वो हैं जो पश्चिमी सभ्यता में कुछ ज्यादा ही ढल चुकी है। परिवार पर चाहे कोई मुसीबत आ जाए इल्जाम इनपर और इनके ऑफिस पर आएगा और चाहे कितनी ही उपलब्धि हासिल क्यों न कर लें ये अपने क्षेत्र में, घर की दहलीज़ पर कदम रखने से पहले उनका ताज उनके सर से उतरवाया जाएगा। ऑफिस से थक कर लौटे जो कभी वो एक दिन तो “घर संभालना तुम्हारा काम है” ये तानों सी बुनी बातों से याद दिलाएंगे मगर अपनी ही इस बहु या उस बेटी को पानी का एक ग्लास नहीं पकड़ाएंगे।

महिलाओं को छोड़ो, हम तो नन्ही बच्चियों को नहीं बक्शते हैं। स्कूल में स्कर्ट ज्यादा छोटी हो गई, बालों की स्टाइल ज्यादा आधुनिक हो गई, काजल ज़्यादा गहरा हो गया, पायल की छनछन ज्यादा गूंज गई, लड़कों से कुछ ज्यादा ही हंस बोल ली, स्कर्ट पर लगा लाल धब्भा लड़कों के लिए थोड़ा ज्यादा असुविधाजनक हो गया। बचपन से ही उनके दिमाग में उनके खिलाफ इतनी बातें भर दी जाती है की जो उम्र कारोबार संभालने, एयरोप्लेन संभालने और देश संभालने में इस्तेमाल की जा सकती है उसे वो अपना ब्रा स्ट्रैप संभालते संभालते खर्च कर देती हैं।

इन सब के बावजूद अगर आप किसी लड़की को देख कर ये सोचने पर मजबूर हो जाते हैं की आखिर एक महिला को समस्या ही क्या है तो वो समाज की नहीं उस महिला की जीत है क्योंकि वो हर मुश्किल को इतनी खूबसूरती से पार करती है की जितनी भी तोड़ी जाए, पहले से और मज़बूत बनती है और ज्यादा निखर कर आती है। और जो पूछ लो उनसे उनकी समस्या तो एक प्यारी से मुस्कान से ज्यादा कुछ कह नहीं पाती है।

source – janta junction

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