भारत के पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी का पिछले साल ब्रेन सर्जरी के बाद निधन हो गया लेकिन जाते जाते उन्होंने अपनी आखिरी संस्मरण को पूरा किया जिसके कारण आज कांग्रेस पर सवालिया निशान उठ रहे है.

पूर्व राष्ट्रपति ने  ‘द प्रेजिडेंशियल ईयर्स’ नामक पुस्तक अपने  निधन से पहले लिखी थी। मंगलवार (जनवरी 5, 2021) को यह पुस्तक बाजार में आई। उनकी आत्मकथा ‘The Presidential Years’ (द प्रेसिडेंसियल ईयर्स) के अनुसार, कॉन्ग्रेस का अपना करिश्माई नेतृत्व खत्म होने की पहचान नहीं कर पाना 2014 के लोकसभा में उसकी हार के कारणों में से एक रहा।

उन्होंने पुस्तक में लिखा है कि यह ” यकीन कर पाना मुश्किल था कि कॉन्ग्रेस सिर्फ 44 सीट जीत सकी। कॉन्ग्रेस एक राष्ट्रीय संस्था है जो लोगों की जिदंगियों से जुड़़ी है। इसका भविष्य हर विचारवान व्यक्ति के लिए हमेशा सोचने का विषय होता है।’’ 

नोटबंदी का भी किया है ज़िक्र

प्रणब मुखर्जी ने अपने किताब में नोट बंदी का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि नोट बंदी की उन्हें किसी भी तरह की जानकारी प्रधानमंत्री द्वारा उन्हें नहीं दी गई थी हालाकि इसके बाद भी उन्हें किसी प्रकार का दुख नहीं हुआ क्युकी नोट बंदी समय की मांग थी और प्रधान मंत्री ने समय की मांग को देखते हुए कदम उठाए थे.

मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काफ़ी अंतर

प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में लिखा कि  “मैंने जिन दो पीएम के साथ काम किया, उनके लिए प्रधानमंत्री बनने का मार्ग बहुत अलग था। सोनिया गाँधी द्वारा डॉ सिंह को पद की पेशकश की गई थी। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी 2014 में ऐतिहासिक जीत के लिए भाजपा का नेतृत्व करने के बाद लोकप्रिय पसंद के माध्यम से प्रधानमंत्री बन गए।”

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि कई नेताओं ने उनसे कहा था कि अगर 2004 में वो प्रधानमंत्री बने होते तो 2014 में इतनी करारी हार नहीं मिलती। प्रणब मुखर्जी ने आगे लिखा है कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद कॉन्ग्रेस ने दिशा खो दी थी और सोनिया गाँधी सही फैसले नहीं कर पा रही थी। मनमोहन सिंह का ज्यादा वक्त अपनी सरकार बचाने में गया जिसका बुरा असर सरकार के कामकाज पर पड़ा।

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