मौहम्मद कैफ़. नाम तो याद होगा. क्रिकेट के मैदान से राजनीति के मैदान में गए कैफ साल 2017 में राजनीति के मैदान को अलविदा कहकर फिर अपने जाने-पहचाने क्रिकेट के मैदान में लौटे थे. याद करें 2014 के लोकसभा चुनाव. अचानक खबर आई थी. उन्हें कांग्रेस की ओर से फूलपुर लोकसभा सीट से उतारा गया था.

लेकिन चुनावों में तो केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला, कैफ़ कैसे जीतते. उधर फूलपुर से चुनाव जीतने वाले केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी की ओर बढ़े, और इधर कैफ़ वापस अपनी पहचानी पिच पर लौट आए.

कैफ़ रणजी ट्रॉफी की नई टीम छत्तीसगढ़ के कप्तान बने. जिनकी ट्रेनिंग भारत के सबसे निडर कप्तान सौरव गांगुली की छत्रछाया में हुई, उन्होंने कुछ महीनों तक छत्तीसगढ़ के नए खिलाड़ियों को ऊंचे दर्जे की क्रिकेट के गुर सिखाए.

आज, 1 दिसंबर 1980 को पैदा हुए कैफ का जन्मदिन है, चलो इसी बहाने उस खिलाड़ी को याद किया जाए, जिसकी फील्डिंग उसकी बल्लेबाज़ी से ज़्यादा मशहूर थी.


मोहम्मद कैफ़ विशेषज्ञ बल्लेबाज़ थे, लेकिन उनका नाम लो तो कभी सबसे पहले उनकी बल्लेबाज़ी याद नहीं आती. कैफ़ का नाम लो तो याद आता है धूल भरे मैदान पर बला की तेज़ी से दौड़ता एक तारबिजली क्रिकेटर. कैफ़ का नाम लो तो याद आता है लॉर्ड्स 2002 का वो आखिरी ओवर. पहले दौड़ता, फिसलता और फिर ज़हीर खान के साथ छलांगे लगाता. कैफ़ का नाम लो तो याद आता है एक अधूरा प्रॉमिस. जिसकी पूरी किस्त तो जमा करवाई, लेकिन उसका पूरा सूद भारतीय क्रिकेट को मिला नहीं. प्यास बाकी रह गई.

मोहम्मद कैफ़ की जानलेवा फील्डिंग के किस्से

एक थे जोंटी रोड्स. बताते हैं कि ज़मीन पर कम और हवा में ज़्यादा दिखाई देते थे. 96 में वर्ल्ड कप खेलने जब इंडिया आए थे तो उनका हल्ला बहुत था. जानकार लोगों ने बताया कि पिछले वर्ल्ड कप में इन्होंने इंज़माम को आउट करने को जो छलांग लगाई थी, उसने ग्राउंड फील्डिंग का नक्शा ही बदल दिया. कहावत चल निकली थी जोंटी के लिए सुपरमैन वाली, ‘इज़ इट ए बर्ड, इज़ इट ए प्लेन..’

हम जोंटी को देखते थे. पॉइंट पर खड़े हो जाते थे और उस ओर तीस गज़ के घेरे के भीतर बनने वाले सारे सिंगल खा जाते थे. इधर अपने खिलाड़ी स्लिप में कैचिंग के चैम्पियन बन रहे थे.

सीधी बात, कि हमारी ग्राउंड फील्डिंग लद्धड़ थी. कभी मैदान पर घास नहीं होने को इसकी वजह बताया जाता. कभी कहा जाता की ये छोटी उमर से फील्डिंग की ट्रेनिंग नहीं मिलने का नतीजा है. कभी खुशफहमी में हम खुद को ये भी मनवा लेते कि हमारे खिलाड़ी तो ‘बड़े शॉट’ मारने वाले खिलाड़ी हैं, उन्हें मैदान में भाग भागकर एक-दो रन बचाने की क्या ज़रूरत!

‘नॉट ए बर्ड, नॉट ए प्लेन, इट्स मोहम्मद कैफ़’

फिर आए कैफ़, युवराज, रितिंदर सोढ़ी और उनके हमउमर नई सदी के भारतीय खिलाड़ी. साल 2000 में अंडर 19 वर्ल्ड कप जीती टीम के प्रतिनिधि. अचानक सुस्त हिन्दुस्तानी टीम की ओर से मैदान पर बिजली की तेज़ी से दौड़नेवाले खिलाड़ी थे. कैफ़ उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जो मैदान में जोंटी रोड्स को देखकर बड़ी हुई थी.

वे गेंद को विकेट पर मारते नहीं थे, गेंद लेकर खुद ही विकेट की ओर कूद जाते थे. 2003 में किंग्समीड साउथ अफ्रीका में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ़ ग्रुप मैच में जिस तरह निक नाइट को आउट किया था, वो हमारा खुद का ‘नॉट ए बर्ड, नॉट ए प्लेन, इट्स मोहम्मद कैफ़’ मोमेंट था.

जोंटी दा का दिया नया फंडा था, “अगर मैं गेंद फेंकूंगा तो 50 परसेंट चांस होगा कि गेंद विकेट पर लगेगी. लेकिन मैं हाथ में गेंद लेकर विकेट पर कूद जाऊं तो 100 परसेंट पक्का है कि गेंद विकेट पर लगेगी ही लगेगी.”


जब सब्सिट्यूट फील्डर बल्लेबाज़ को लील गया

मैदान पर सही-सटीक ‘स्लेजिंग’ भी फील्डिंग का हिस्सा है यह भारतीय टीम को सौरव गांगुली की कप्तानी में ही समझ में आया. गांगुली ने तो स्लेजिंग के लिए बदनाम ऑस्ट्रेलिया को भी टॉस पर इंतज़ार की घुट्टी पिलाकर सीधा कर दिया था. कैफ़ की ट्रेनिंग इसी दौर में हुई, खुद गांगुली की सरपरस्ती में.

2005 में जब पाक टीम भारत आई, तबकी बात है. इडेन गार्डन्स में टेस्ट था. पाकिस्तान के सबसे धाकड़ बल्लेबाज़ों में से एक युसुफ़ योहान्ना (मोहम्मद यूसुफ़) क्रीज़ पर थे. अपनी आदत के अनुसार पिच पर खूंटा गाड़कर अड़ गए थे और 80 से ज़्यादा गेंद खेलकर 20 पर खेल रहे थे.

फिर कैफ़ मैदान में बुलाए गए, सब्सिट्यूट फील्डर. और कैफ़ विकेट के पीछे लेग स्लिप में खड़े होकर यूसुफ़ को खरी खरी सुनाने लगे. ‘अरे बाउंड्री वाले फील्डरों को भीतर बुला लो.. एक भी चौक्का नहीं मारा और सत्तासी बॉल खेल लीं..’ उन्होंने आवाज़ लगाकर दूसरों को सुनाना शुरु किया.  पहली पारी के शतकवीर यूसुफ़ हंस रहे थे, लेकिन कैफ़ का तीर सही जगह लगा. 22 के स्कोर पर जमे हुए यूसुफ़ का धैर्य चुक गया. उन्हें कुंबले की बाउंसी गेंद लील गई.

आगे रज़्ज़ाक जब पिच पर आए तो उन्हें कैफ़ बोल रहे हैं, “आज बात ही नहीं कर रहा! ये इतनी बात करता है बॉलिंग में, बोलो! आज तो आवाज़ ही नहीं निकल रही.”

पाकिस्तान 226 पर ऑलआउट हो गया, और भारत 195 रन से मैच जीता. किसी ने इन विकेटों पर सबस्टिट्यूट फील्डर मोहम्मद कैफ़ का नाम नहीं लिखा. कैफ़ फिर यहां अपनी आदत के अनुसार टीम के काम आए.


जब हमने दुस्साहस सीखा

और जाने से पहले वो चमत्कारिक क्षण भी देख लें, जिसने मोहम्मद कैफ़ को नई सदी में नई भारतीय क्रिकेट का पोस्टर ब्वॉय बनाया. वो मैच जिसने टीम को विश्वास के नए धागे में बांधा. जिस क्षण भारतीय क्रिकेट में एक नई किस्म की क्रिकेट का जन्म हुआ, जिसके अगुआ सौरव गांगुली बने.

नटवेस्ट सीरीज़ का फाइनल!

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