आज दलित के नाम पर राजनीति चमकाने वाली तमाम पार्टियां हैं। देशभर की राजनीतिक पार्टियां हमेशा दलित, पिछड़ा, बाबा साहब अंबेडकर, लोहिया और कांशीराम के नाम पर राजनीति साधती आई है लेकिन उनके नाम पर वोट लेने के बाद पार्टियां अगर वास्तव में दलितों और पिछड़ों को याद रखती तो आज आजादी के इतने सालों बाद उन्हें दलित या शोषित कहने की ज़रूरत ही ना पड़ती।

आज हम यह सब बात इसलिए कर रहे है क्योंकि आज बहुजन आंदोलन के नायक और देश के दलितों में एक नई चेतना लाने वाले कांशीराम का जन्मदिवस है।

आज तमाम नेता उनके फोटो पर फूल और माला चढ़ा कर आने वाले चुनाव में दलित वर्ग का साथ पाने का हल्ला मचाएंगे। आज की राजनीति में सबसे ज़रूरी मान लिया गया है कि जिस भी वर्ग को अपने साथ लाना हो उस वर्ग के किसी बड़े नेता की प्रतिमा बनाई जाए, चौक-चौराहों पर उनकी मूर्तियां लगाई जाए और इस प्रकार से उस पूरे वर्ग को चुनाव के लिगाज से साध लिया जाए।

आज हम कांशीराम के कई अनसुने किस्सों को जानेंगे। आपको उस कहानी के बारे में बताएंगे कि कैसे कांशीराम देश के राष्ट्रपति बनते-बनते रह गए थे? कैसे जगजीवन राम जैसे बड़े नेता के रहते हुए उन्होंने उनसे अलग हटकर एक नया आंदोलन चलाया और दलित वर्ग के लोगों को अपने साथ जोड़ा। आखिर क्यों आखिरी वक्त में कांशीराम की मां रोते हुए उनका इंतजार करती रही लेकिन वे कभी अपनी मां से मिलने नहीं गए?

एक सवाल हमेशा सोशल मीडिया पर घूमता रहता है कि क्या कांशीराम वाकई में दलित वर्ग से आते थे? इसमें कई तर्क दिए जाते हैं कि वे जन्म से सिख थे और मृत्यु के समय बौद्ध तो आखिर दलित कब हो गए? आज आप इस पूरी कहानी को समझ लीजिए।

1930-40 के आस-पास पंजाब में बसने वाले कई हिंदू परिवारों ने सिख धर्म को अपना लिया था। इसका कारण था कि हिंदू धर्म में पिछड़े या फिर दलित वर्ग से आने वाले लोगों से ज्यादा भेदभाव किया जाता था लेकिन सिख धर्म में यह सब कम था। उस समय पंजाब में रहने वाले कई दलित परिवारों ने हिन्दू धर्म को छोड़ सिख धर्म को अपना लिया था और इन्ही परिवारों में से एक परिवार कांशीराम का था। कांशीराम का परिवार हिन्दू धर्म के दलित जाति ‘हरिजन’ से ताल्लुक रखता था लेकिन बाद में उनके परिवार ने सिख धर्म को अपना लिया था और इसी कारण कांशीराम को जन्म से सिख बता दिया जाता है लेकिन सिख धर्म अपनाने के बावजूद उनके परिवार के ऊपर से हरिजन जाति का जो ठप्पा था वो खत्म तो नहीं हुआ था। उस परिवार के साथ फिर भी कही ना कही भेद-भाव किया ही जाता था।

वैसे कांशीराम का जन्म जिस परिवार में हुआ था वो आर्थिक रूप से मजबूत परिवार था। उस समय गिने-चुने ही ऐसे दलित परिवार होते थे जो आर्थिक रूप से मजबूत हो। कांशीराम के पिता हरि सिंह के भाई सेना में थे। खुद कांशीराम के पिता हरि सिंह सिर्फ इसलिए सेना में भर्ती नहीं हुए क्योंकि उनके परिवार के पास 4 एकड़ पैतृक जमीन थी और उसकी देखरेख करने के लिए कोई घर पर होना आवश्यक था।

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के गांव खवासपुर में हुआ था। जब देश मे प्रधानमंत्री पद के लिए खूब रस्सा-कस्सी चल रही थी तब कांशीराम साईकल से घूम-घूम कर बहुजन समाज को एकजुट करने की कोशिश कर रहे थे। अगर हम कांग्रेस में आज तक के सबसे बड़े दलित नेता की बात करें तो जगजीवन राम से ऊपर किसी का नाम नहीं आ सकता। जगजीवन राम अकेले ऐसे कांग्रेसी नेता है जो कांग्रेस में इतना ऊपर गए की एक समय उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री माने जाने लगा था। इमरजेंसी के बाद जगजीवन राम भी उन कांग्रेसी नेताओं में शामिल थे जिन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो उम्मीद के मुताबिक कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और जनता पार्टी के हाथ में देश की सत्ता गई।

अब यहां से शुरू हुआ रस्साकशी का दौर की किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए। जगजीवन राम उसमें बड़े चेहरे थे लेकिन जेपी नारायण ने उनका साथ नहीं दिया और वे प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे। प्रधानमंत्री बनाये गए मोरारजी देसाई। जिस समय देश की राजनीति यह सब कुछ देख रही थी उसी समय बहुजन आंदोलन का अगुआ बनकर एक व्यक्ति देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर रहा था। वो व्यक्ति अच्छा-खासा सरकारी नौकरी में था लेकिन बहुजन आंदोलन का ऐसा नशा था कि उसने सरकारी नौकरी तक को छोड़ दिया। उस व्यक्ति को आज हम सब लोग कांशीराम के नाम से जानते है।

कांशीराम ने जब बहुजन आंदोलन की शुरुआत की तो घरवालों को एक पत्र लिखा था कुल 24 पन्नों का। उसमें उन्होंने लिखा था कि ‘अब मैं अपने घर कभी वापस नहीं आऊंगा, कभी खुद का घर नहीं खरीदूंगा, सारे रिश्तेदारी और बंधनों से मुक्त रहूंगा, कोई सरकारी नौकरी नहीं करूंगा।’ और भी बहुत सारी चीजे इस पत्र में लिखी गयी थी। कांशीराम ने इसके बाद देश घूमना शुरू किया। बाबा साहब का जनदिवस होता 14 अप्रैल। इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि 14 अप्रैल 1973 को ही कांशीराम ने बाबा साहब अंबेडकर के जन्मदिवस वाले दिन ऑल इंडिया बैकवर्ड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉईज फेडरेशन का गठन किया था। इसके बाद 6 दिसंबर 1978 को DS-4 अस्तित्व में आया। इसका मतलब होता है कि दलित शोषित समाज संघर्ष समिति।

इसके बाद उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन का सबसे ज्यादा असर हुआ। 1984 में बहुजन समाज पार्टी और फिर कांशीराम खुल कर राजनीति में उतर गए। पहले चुनाव में तो बसपा सीट नहीं जीत सकी लेकिन कुछ नारे सुनाई देने लगे थे जिनको लेकर आज भी विवाद है। वह नारे थे कि ‘ठाकुर ब्राह्मण बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएस 4।’ एक और नारा था ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।’ अब इस नारे को लेकर कांशीराम के परिवार का क्या दावा है उसे भी सुन लीजिए।

नारे की सच्चाई जानने से पहले उनकी मां के बारे में थोड़ा-बहुत जान लीजिए। बीबीसी ने एक रिपोर्ट प्रकाशित किया था। उस रिपोर्ट का नाम है ‘मां इंतज़ार करती रहीं लेकिन कांशीराम नहीं आए।’ इस रिपोर्ट में परिवार के हवाले से लिखा गया है कि बसपा सुप्रीमों मायावती ने 2003 में यह सूचना भेजी की कांशीराम की तबियत खराब है और इलाज के लिए पैसे नहीं है। मायावती ने इलाज के लिए पैसे मांगे थे। कांशीराम की छोटी बहन स्वर्ण कौर ने बताया कि ‘मां ने बिना समय गंवाए अपने सोने के कंगन दे दिए।’ कांशीराम की मां बिशन कौर भी उस समय काफी बीमार चल रहीं थी। अस्पताल में कांशीराम की मां ने एक बार डॉक्टर से पूछा कि ‘साहेब का क्या हाल है?’ इस पर डॉक्टरों ने कहा था कि ‘साहेब ठीक है और उन्होंने आपका ख्याल रखने को कहा है।’

मृत्यु के समय तक उनकी मां समझती रही कि साहेब के कहने पर ही डॉक्टर उनका ख्याल रख रहे हैं बल्कि सच्चाई तो यह थी कि साहेब खुद अस्पताल में गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। जब कांशीराम बीमार थे और उनकी मां को उनसे मिलना था तब बसपा सुप्रीमो मायावती और कांशीराम की मां के बीच लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। उनकी मां को दो बार उनसे मिलने का भी मौका मिला था। उनकी बहन ने बीबीसी को बताया कि ‘जब टीवी में यह खबर चल रही थी कि मां के अस्पताल से वापस आते है अमिताभ बच्चन उनसे मिलने गए तो मेरी मां कहने लगी कि जब कांशी अच्छा हो जाएगा तो मुझसे मिलने आएगा’। उनकी मां अंतिम दिन तक अपने बेटे का इंतजार करती रही लेकिन वो कभी वापस नहीं आये।

इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि कांशीराम की बहन स्वर्ण कौर और कांशीराम के पुराने सहयोगी तथा 2 बार विधायक रह चुके शींगारा सिंह ने कहा कि ‘तिलक तराज़ू और तलवार, इनको मारो जूते चार,’ का नारा कांशीराम ने कभी दिया ही नहीं। यहां तक कि कांशीराम के तीन खास दोस्तों में कोई भी दलित नहीं था बल्कि उनमें से एक तो खुद ब्राह्मण थे।

एक और किस्सा काफी खास है। यह तबका है जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में NDA की सरकार चल रही थी। उस समय कांशीराम को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के तरफ से एक ऑफर दिया गया। ऑफर था कि कांशीराम देश के राष्ट्रपति बन जाये। अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि कांशीराम राष्ट्रपति बन जाये जिससे समाजिक समीकरण उनके पक्ष में बने। अटल जी ने जब उनके सामने यह प्रस्ताव रखा तो उन्होनें इसे ठुकरा दिया। इसके पीछे की वजह बताई जाती है कि उनके मन में प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब था। कांशीराम की मौत के बाद उनके परिवार ने उनकी मौत को लेकर मायावती पर कई तरह के आरोप भी लगाए लेकिन शायद यही राजनीति है जिसकी अंत का कोई ठिकाना नहीं होता।

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