सरकार काफी दिनों से सोशल मीडिया और OTT ऐप्स को रेगुलेट करने की बात करती रही है. इस सिलसिले में गुरुवार को बड़ी घोषणाएं हुईं. आईटी मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद और इन्फॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर प्रकाश जावड़ेकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मीडिया को लेकर नए नियमों का ऐलान किया. इन नियम कायदों को सरकार ने ‘सॉफ्ट टच मैकेनिज्म’ नाम दिया. मतलब ऐसा मकैनिज्म जिसे प्लेटफॉर्म खुद ही बनाएं और रेगुलेट करें. लेकिन सरकार ने कई सख्त नियम भी जोड़े हैं. बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट की जानकारी देने और शिकायतों को सुलझाने का सिस्टम बनाने को कहा गया है. आइए तफ्सील से जानते हैं किस सेक्शन के लिए क्या नियम बनाए गए हैं.

सोशल मीडिया के लिए

# सरकार ने जानकारी दी कि भारत में 53 करोड़ वॉट्सऐप, 41 करोड़ फेसबुक, 21 करोड़ इंस्टाग्राम और 1.75 करोड़ ट्विटर यूजर हैं. ऐसे में जरूरी है कि इन प्लेटफॉर्म्स के लिए कुछ जरूरी नियम-कायदे बनाए जाएं.

# किसी भी यूजर की गरिमा को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को और सख्ती दिखानी होगी. खासतौर पर महिलाओं के मामले में. अगर कोई महिला किसी ऐसे कंटेंट के बारे में शिकायत करती है जिससे उसकी गरिमा को धक्का लगता है तो उसे 24 घंटे में हटाना होगा. मिसाल के तौर पर प्राइवेट पार्ट, अंतरंग तस्वीरें या फर्जी अकाउंट आदि. इस तरह की शिकायत यूजर या उसकी तरफ से कोई दूसरा भी कर सकेगा.

# सरकार ने सोशल मीडिया की दो कैटेगिरी बना दी हैं. पहली सोशल मीडिया इंटरमीडिएटरी औऱ दूसरी सिग्निफिकेंस सोशल मीडिया इंटरमीडिएटरी. इनमें फर्क सिर्फ इतना है कि बड़े प्लेटफॉर्म्स को सिग्निफिकेंट सोशल मीडिया इंटरमीडिएटरी में रखा जाएगा, और छोटे को साधारण में. कैटेगिरी के हिसाब से यूजर्स की संख्या भी सरकार जल्द ही बताएगी. हालांकि ये मानकर चल सकते हैं कि सरकार फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप को सिग्निफिकेंस सोशल मीडिया इंटरमीडिएटरी की कैटेगिरी में ही रखेगी.

# सख्त नियम-कायदों का प्रावधान सिग्निफिकेंस सोशल मीडिया इंटरमीडिएटरी के लिए है. इन सभी सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में एक चीफ कंप्लायंस ऑफिसर, नोडल कॉन्टैक्ट पर्सन और रेजिडेंट ग्रीवांस ऑफिसर रखना जरूरी होगा. ये नियम कानूनों का पालन सुनिश्चित कराएंगे.

# नोडल कॉन्टैक्ट पर्सन को सरकारी एजेंसियों के लिए 24×7 मतलब 24 घंटे उपलब्ध रहना होगा.

# 24 घंटे के भीतर किसी भी कंप्लायंस पर यूजर को जानकारी देनी होगी. 15 दिन के भीतर उस शिकायत पर एक्शन लेकर यूजर को बताना होगा.

# हर महीने सोशल मीडिया कंपनियों को एक ग्रीवांस रिपोर्ट देनी होगी. इसमें वे बताएंगे कि महीने भर में उनके पास कैसी और कितनी शिकायतें आईं, और उन पर क्या एक्शन लिया गया.

सरकार ने सोशल मीडिया को रेग्युलेट करने के लिए सख्त प्रावधान तैयार कर दिए हैं. (फोटो – इंडिया टुडे)

# सोशल मीडिया कंपनी का भारत में एक फिजिकल अड्रेस होना और उसे वेबसाइट या ऐप पर दिखाना जरूरी होगा.

# एक खास वॉलेंटरी यूज़र वेरिफिकेशन मैकेनिज्म बनाना होगा. मतलब अगर कोई यूज़र अपनी इच्छा से अपना सोशल मीडिया अकाउंट वेरिफाई करवाना चाहता है तो उसे मौका दिया जाएगा. उस यूजर को वेरिफिकेशन के बाद एक खास निशान भी दिया जाए. यह वेरिफिकेशन कैसे किया जाएगा, इसका जिम्मा सोशल मीडिया के ऊपर ही डाला गया है.

# अगर कोई सोशल मीडिया कंपनी किसी यूजर का कंटेंट अपने आप हटाती है तो उस यूजर को भी अपनी बात रखने का मौका दिया जाए. कंटेंट हटाने से पहले यूजर को बताना होगा कि आखिर उसका कंटेंट क्यों हटाया जा रहा है.

# अगर कोर्ट या सरकारी एजेंसी किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कोई जानकारी होस्ट करने या पब्लिश करने से मना करती है तो उसे वो मानना होगा. इस जानकारी में देश की एकता-अखंडता को खतरे में डालने वाली, कानून-व्यवस्था को भंग करने वाली, दोस्त देशों से रिश्ते खराब करने वाली जानकारी शामिल हो सकती है.

# सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी पोस्ट या कंटेंट के फर्स्ट ओरिजिनेटर की जानकारी सरकार को देनी होगी. मतलब सरकार किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यह पूछ सकती है कि किसी मेसेज या कंटेंट को सबसे पहले किसने डाला. अगर विदेशी धरती से डाला गया होगा तो बताना होगा कि देश में उसे किसने फैलाया. हालांकि सरकार ऐसे ही मामलों में यह जानकारी मांग सकेगी जिनमें 5 साल तक की सजा का प्रावधान है. सरकार इसे देश की अखंडता के खिलाफ चलाए गए मेसेजों और सोशल मीडिया के जरिए मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाया गया कदम बता रही है.

# ये नियम कायदे गजट में प्रकाशित होते ही लागू हो जाएंगे. हालांकि बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों को गजट में नियम छपने के बाद 3 महीने का वक्त मिलेगा. ये ऐसी कंपनियां हैं, जिनको ज्यादा एहतियात बरतने और अधिकारी आदि नियुक्त करने के लिए कहा गया है.

OTT के लिए नियम

# आईबी मिनिस्टर प्रकाश जावडेकर ने बताया कि उनके पास 40 ओटीटी प्लेटफॉर्म की जानकारी है. सभी प्लेटफॉर्म से 3 बार बात करने के बाद जब कोई सेल्फ रेग्युलेटिंग मैकेनिज्म नहीं बन सका तो नए नियम लाने का फैसला किया गया.

# OTT प्‍लेटफॉर्म्‍स को टीवी और अखबार की तरह एक सेल्‍फ रेगुलेशन बॉडी बनानी होगी. इसे सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या कोई नामी हस्‍ती हेड करेगी.

# ओटीटी पर दिखाए जाने वाले सीरियलों पर वैसी ही गाइडलाइन लागू होंगी, जो टीवी के लिए हैं. मतलब ओटीटी को भी टीवी चैनलों के लिए बनाए प्रोग्राम एंड कोड के नियम-कायदों का पालन करना होगा.

# जहां तक बात मूवीज़ की है तो इसमें किसी भी तरह के सेंसर की बात नहीं की गई है. इन्हें व्यूअर्स की उम्र हिसाब से अलग-अलग कैटेगिरी में रखना होगा. मिसाल के तौर पर 13 साल से ऊपर, 16 साल से ऊपर या अडल्ट आदि.

# इसके अलावा पैरेंटल कंटेंट कंट्रोल की सुविधा देनी होगी. इससे लोग ये तय कर सकेंगे कि उनके घर में किसी खास कैटेगिरी का कंटेंट बच्चे न देख सकें.

स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म्स को भी सरकार ने टीवी की तरह नियम-कायदे बांधने का इंतजाम कर दिया है.

डिजिटल न्यूज मीडिया के लिए नियम

# आईबी मिनिस्टर ने माना कि उन्हें यह खुद नहीं पता है कि देश में कितने पोर्टल हैं, जो न्यूज दिखा रहे हैं. ऐसे में सबसे पहली जरूरत तो इस बात की है कि ये जानकारी जुटाई जाए.

# इसके लिए डिजिटल न्‍यूज मीडिया को अपने बारे में विस्‍तृत जानकारी देनी होगी. टीवी और अखबार की तरह उन्हें भी रजिस्‍ट्रेशन कराना जरूरी होगा.

# डिजिटल न्यूज मीडिया को बताना होगा कि उसका मालिक कौन है और उसमें किसने पैसा लगाया है.

# टीवी और अखबार की तरह डिजिटल न्यूज मीडिया में भी ग्रीवांस रिड्रेसल सिस्‍टम लागू करना होगा. मतलब शिकायतों पर कार्रवाई का सिस्टम बनाना होगा. अगर गलती पाई गई तो खुद से रेगुलेट करना होगा. जैसे टीवी या अखबार में भूल-सुधार या पेनाल्टी का प्रावधान है, वैसा ही प्रावधान डिजिटल न्यूज मीडिया के बारे में भी किया गया है.

न्यूज पोर्टल को भी अखबार और टीवी के न्यूज चैनल की तरह अपने को रजिस्टर करवाना होगा. कार्यक्रम से शिकायत होने पर एक्शन भी लेना होगा.

लंबे समय से हो रही थी मांग

बीजेपी के कई सांसदों ने 12 फरवरी को लोकसभा में वेब सीरीज को सेंसरशिप के दायरे में लाने की मांग की थी. बीजेपी सांसदों का कहना था कि मोबाइल पर वेब सीरीज के माध्यम से हिंसा, गालियां परोसी जा रही हैं. धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है. इसके लिए सेंसरशिप की व्यवस्था की जाए. सुप्रीम कोर्ट में भी OTT और सोशल मीडिया का मामला कई बार पहुंच चुका है. केंद्र सरकार ने पिछले हफ्ते ही सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह OTT प्‍लेटफॉर्म्‍स को रेगुलेट करने के क्‍या कदम उठाने पर विचार कर रही है. पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा था. इसमें विभिन्न ओटीटी/स्ट्रीमिंग और डिजिटल मीडिया प्लेटफार्मों के कंटेंट की निगरानी और प्रबंधन के लिए सिस्टम बनाने की मांग की गई थी.

source – TV Today Network

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