मधु लिमये वो नेता जिसे देखकर सत्ता पक्ष कांप जाता था। वो नेता जो जब संसद भवन में कागजों से भरे फाइलों को लेकर घुसता था तो सरकार के मंत्रियों की हालत बिगड़ जाती थी। वो नेता जिसकी जन्मभूमि महाराष्ट्र थी लेकिन सांसद बिहार से चुने गए वो भी एक बार नहीं बल्कि चार बार। आज 8 जनवरी है और आज के दिन भारत तथा बिहार की राजनीति को प्रभावित करने वाले मधु लिमये की पुण्यतिथि है। मधु लिमये को चाह कर भी बिहार या फिर भारत की राजनीति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

तो सबसे पहले शुरुआत करते है मधु लिमये साहब से

बीबीसी ने अपने एक आर्टिकल में लिखा है कि 60 और 70 के दशक में एक शख्स ऐसा हुआ करता था जो कागजों का पुलिंदा बगल में दबाए हुए जब संसद में प्रवेश करता था तो ट्रेजरी बेंच पर बैठने वालों की फूंक सरक जाया करती थी कि ना जाने आज किसकी शामत आने वाली है। आप इन चंद लाइनों से उनकी शख्सियत का अंदाजा लगा सकते हैं।

हम कहानी को शुरुआत से शुरू करते हैं। 1 मई 1922 को मधु लिमये साहब का जन्म हुआ था। जन्म से मराठी थे। वे मूल रूप से पुणे के रहने वाले थे। पूरा बचपन महाराष्ट्र में बीता, पढ़ाई लिखाई भी महाराष्ट्र में ही हुई और फिर राजनीति की शुरुआत भी महाराष्ट्र से ही हुई। गौरतलब है कि मधु साहब बचपन से ही समाजवादी विचारधारा के प्रभाव में आ गए थे। बताया जाता है कि मात्र 14-15 साल की उम्र में उन्होंने आजादी के आंदोलन में जोर-शोर से भाग लिया और उस समय उन्हें जेल भी जाना पड़ा। जब द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था तब भी वे जेल में ही थे।

विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जब जेल से छूटे तो गोवा की मुक्ति के लिए सत्याग्रह शुरू हुआ और फिर जेल चले गए। उस समय उन्हें 12 साल की सजा सुनाई गई थी। इन सारे संघर्षों को झेलते हुए आखिरकार मधु साहब बिहार पहुँच गए। यूं तो एक मराठी व्यक्ति का बिहार में आकर राजनीति करना और उसमें सफल भी होना इतनी आसानी से हजम नहीं होता है लेकिन शायद कुछ लोग राजनीति के नियम को बदलने के लिए ही जन्म लेते हैं।

राष्ट्रीय राजनीति में मधु साहब ने बिहार के मुंगेर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर कदम रखा ।1964 में यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी बनी थी और मधु साहब को टिकट भी मिला था। मधु लिमये पहली बार यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर लोकसभा पहुंचे और इसी जीत के साथ उन्हें इस पार्टी के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष भी बना दिया गया। अच्छा, ऐसा नहीं था कि क्षेत्रवाद को लेकर उनपर हमला नहीं बोला जाता था। जब मधु साहब बिहार के बांका से चुनाव लड़ रहे थे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा राय में क्षेत्रवाद के नाम पर उनका विरोध करना शुरू किया।

कहा जाता है कि दारोगा राय अपनी हर सभा में बोलते थे ‘मधु लिमैया, बंबईया’। लिमये गुट के लोग भी दरोगा राय पर हमला बोलते और कहते थे कि यह तो अच्छा था कि दरोगा जी चंपारण आंदोलन के वक्त नहीं थे वरना गांधी जी को तो बिहार की सीमा में घुसने ही नहीं देते। इसके अलावा कहा जाता था कि अगर श्रीमान त्रेता युग में पैदा हो जाते हैं तो अयोध्या के राम की शादी जनकपुर मतलब कि नेपाल की सीता से कभी नहीं होने देते। यह सारी चीजें आज भी राजनीति में होती है हर उस समय भी होती थी।

अच्छा बिहार से राजनीति करने वाले मधु साहब ने अपना सारा शुरुआती संघर्ष महाराष्ट्र में बिताया था लेकिन जब वे महाराष्ट्र से चुनाव लड़े थे तब उन्हें सफलता नहीं मिली थी लेकिन बिहार में आकर यहां की राजनीति में अच्छी पकड़ बना लिया था। 1964 में पहली बार मुंगेर से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे, 1967 के चुनाव में फिर से यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर मुंगेर से चुनाव जीते। 1973 के चुनाव में बांका लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर लोकसभा में पहुँचे। 1967 लोकसभा के बाद मधु साहब ने यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी को छोड़ दिया था। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बांका लोकसभा सीट से एक बार फिर चुनावी मैदान में कूद पड़े। बांका सीट से एक बार फिर लोकसभा में पहुंचे। 1980 के लोकसभा चुनाव में वे फिर से बांका सीट से चुनावी मैदान में थे लेकिन इस बार किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया।

इसके बाद उनका स्वास्थ्य साथ छोड़ने लगा और मधु साहब फिर कभी चुनाव मैदान में नहीं उतरे। बताया जाता है कि महाराष्ट्र से आने के बाद मधु साहब ने बिहार से लोकसभा का कुल 6 चुनाव लड़ा था जिसमें से चार बार जीत हासिल हुई थी। 1971 में मुंगेर से और 1980 में बांका से चुनाव हार गए। भारतीय राजनीतिक इतिहास में ऐसे बहुत कम नेता हुए हैं जो किसी दूसरे राज्य से आकर किसी दूसरे राज्य में चुनाव लड़ते हैं और जनता उन्हें बार-बार वही प्यार देती रहती है।

बताया जाता है कि उस समय लोग विचारधारा और मुद्दों को देखकर वोट देते थे इसीलिए मधु साहब चुनाव जीत जाते थे। जाति वाली समस्या तो उस समय भी थी लेकिन उस पर विचारधारा और मुद्दा उस दौर में भारी पड़ रहा था। कहा जाता है कि मधु लिमये साहब जब संसद भवन में पहुंचते थे तो विपक्षी पार्टियों का हाथ पांव फूल जाता था। उन्हें इस बात का डर रहता था कि आज ना जाने किस पर मधु लिमये साहब का दिमाग घूम जाए। मधु लिमये साहब राजनेताओं को मिलने वाली पेंशन के विरोधी थे। मधु साहब ने चुनाव हारने के बाद कभी पेंशन नहीं लिया। उन्होंने अपनी पत्नी से भी कहा था कि उनकी मौत के बाद किसी तरह की कोई पेंशन ना ले। मधु लिमये साहब ने 8 जनवरी 1995 को इस दुनिया से विदा ले लिया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हैं।

Source – JJ

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