बिहार विधानसभा का भवन आज 100 साल पूरा हो गया है। 7 फरवरी 2021  यानी आज  इस भवन की शताब्दी पूरी हो रही है। ऐसे में हमने जब बिहार विधानसभा के पन्नों को पलटने की कोशिश की तो पाया कि इस भवन ने अपनी झोली में बेशुमार यादगारियां संजो रखी हैं। इस भवन ने कई सरकारें, कई मुख्यमंत्री, कई विधानसभा अध्यक्ष देखे हैं। बंगाल से अलग होने के बाद से बिहार विधान सभा में फिलहाल 243 विधायक है लेकिन जब विधान सभा की शुरुआत हुई थी , उस समय विधायक की संख्या 300 से अधिक हुआ करता था।

आरंभ में विस के सदस्यों की संख्या थी 330 

सन् 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ। इसके प्रावधानों के अनुरूप 1952 एवं 1957 में पहला एवं दूसरा आम चुनाव सम्पन्न हुआ। 1952 के चुनाव में विधानसभा के लिए 330 सदस्य निर्वाचित हुए जबकि एक सदस्य का मनोनयन हुआ। 1956 में राज्य पुर्नगठन आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर बिहार की सीमा में फिर बदलाव हुआ। इससे विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या घटकर 318 हो गयी, हालांकि मनोनीत सदस्य एक बचे रहे। सन् 1962, 67, 69 (मध्यावधि चुनाव) एवं 1972 के चुनावों में सदस्यों की संख्या 319 ही रही। सन् 1977 में जनसंख्या वृद्ध के अनुपात में बिहार में विधानसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या में छह का इजाफा हुआ है।

भोला यादव के कार्यकाल के दौरान तीन बार लगा था राष्ट्रपति शासन 

विधानसभा में उपलब्ध रेकार्ड के मुताबिक एक रोचक तथ्य यह भी है कि भोला पासवान शास्त्री अकेले ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिनके शासन काल में तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा। पहली बार उनके सीएम रहते 29 जून 1968 को सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा और यह 244 दिन रहा। दूसरी बार  4 जुलाई 1969 (227 दिन) और तीसरी बार 9 जनवरी 1972 में 70 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया। 30 अप्रैल 1977 को जगन्नाथ मिश्र के सीएम काल में (54 दिन), 17 फरवरी 1980 को रामसुंदर दास के मुख्यमंत्री रहते (112 दिन), छठी बार 28 मार्च 1995 को लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री रहते 7 दिन के लिए, 12 फरवरी 1999 को राबड़ी देवी के रहते 25 दिन के लिए और 7 मार्च 2005 को 262 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

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