ये शब्द पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के हैं. वे रविवार को क्वेटा में पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) की तीसरी रैली को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए संबोधित कर रहे थे.

20 सितंबर को पाकिस्तान की सभी विपक्षी पार्टियों ने इस्लामाबाद में मिलकर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का गठन किया था और इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ पूरे पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की थी.

अपने भाषण में नवाज़ शरीफ़ ने केवल जनरल मुशर्रफ़ पर ही निशाना नहीं साधा. उन्होंने पाकिस्तानी फ़ौज प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा और आईएसआई चीफ़ जनरल फ़ैज़ हमीद पर भी आरोप लगाए.

उन्होंने कहा, “जनरल बाजवा साहब, आपको साल 2018 के इलेक्शन में पाकिस्तान की तारीख़ की सबसे बड़ी धांधली और अवाम के मैंडेट की चोरी का हिसाब देना है.”

नवाज़ शरीफ़ ने कहा, “तबाही और बर्बादी के इल्ज़ाम के छींटे पाकिस्तानी फ़ौज के जवानों और अफ़सरों की वर्दी पर न पड़ें, इसलिए वो इसके लिए सभी ज़िम्मेदार किरदारों का नाम ले रहे हैं. आज तमाम सवालों के जवाब फ़ौज को नहीं, जनरल क़मर जावेद बाजवा और जनरल फैज़ हमीद को देने हैं.”

फ़िलहाल क्वेटा रैली के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान या पाकिस्तान की सेना की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पीडीएम की पहली रैली में सेना प्रमुख पर हमले को लेकर उन्होंने कहा था कि ये हमला सेना प्रमुख पर नहीं, बल्कि सेना पर है.

छोड़िए Twitter पोस्ट, 1

पोस्ट Twitter समाप्त, 1

नवाज़ शरीफ़ ने जिस अंदाज़ में पिछली तीन रैलियों में पाकिस्तानी फ़ौज के बारे में मोर्चा खोला है, वो बिल्कुल नया है.

फ़ौज को लेकर नवाज़ शरीफ़ के आक्रामक होने की वजह?

पाकिस्तान में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद कहते हैं, “नवाज़ शरीफ़ को सियासत में लाने वाली भी फ़ौज ही थी. लेकिन आगे चल कर नवाज़ शरीफ़ के ताल्लुक़ात इनसे ख़राब हो गए थे. तीन बार ये पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे. नवाज़ शरीफ़ का आरोप है कि तीनों बार फ़ौज की वजह से अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. उनकी सरकार को फ़ौज ने चलता कर दिया. इस वजह से नवाज़ शरीफ़ के दिल में फ़ौज के प्रति एक कड़वाहट है. लेकिन हालिया दिनों में उनके फ़ौज के ख़िलाफ़ बयानों में जो तेज़ी आई है, उसके पीछे की वजह कुछ और है.”

वे कहते हैं, “नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के नेता मोहम्मद ज़ुबैर की इसी साल अगस्त में पाकिस्तानी फ़ौज प्रमुख जनरल बाजवा से कुछ मुलाक़ातें हुई थीं. इन मुलाक़ातों से पहले इस बारे में न तो फ़ौज की तरफ़ से कोई एलान किया गया और न ही नवाज़ शरीफ़ की पार्टी की तरफ़ से. बाद में कुछ बात बिगड़ी और पाकिस्तान फ़ौज के प्रवक्ता ने ख़ुद राष्ट्रीय टेलीविज़न पर आकर ऐलान किया कि फ़ौज प्रमुख और मोहम्मद ज़ुबैर की बातचीत चल रही थी. इस वजह से नवाज़ शरीफ़ को लगता है कि फ़ौज ने एक बार फिर से उनके साथ ठीक नहीं किया है. वो एक सीक्रेट मीटिंग थी, जिसमें दोनों तरफ़ से रज़ामंदी थी.”

पाकिस्तान

“ये ताज़ा वजह है नवाज़ शरीफ़ और फ़ौज के बीच कड़वाहट दोबारा शुरू होने की. इससे पार्टी को सार्वजनिक तौर पर फ़ज़ीहत का सामना करना पड़ा है. इसके बाद उनकी पार्टी की तरफ़ से ऐलान किया गया था कि फ़ौज से पार्टी का कोई नेता मिलेगा, तो पार्टी इस बारे में ख़ुद बताएगी.”

हारून कहते हैं कि इस मुलाक़ात की वजह से नवाज़ शरीफ़ की पार्टी को काफ़ी नुक़सान हुआ. जब से इमरान ख़ान पाकिस्तान की सत्ता पर क़ाबिज़ हुए हैं, एक तरफ़ नवाज़ शरीफ़ फ़ौज को लेकर बयान दे रहे हैं और दूसरी तरफ़ उन्हीं की पार्टी के नेता, फ़ौज प्रमुख के साथ मुलाक़ातें कर रहे हैं.

ये बात न तो पार्टी की छवि के लिए ठीक रही और न ही ख़ुद नवाज़ शरीफ़ के लिए सही साबित हुई. इसलिए उन्होंने सोचा कि जब फ़ौज उनके सीक्रेट को दबा कर नहीं रख सकती, तो फिर वे क्यों चुप रहें?

इस वजह से नवाज़ शरीफ़ फ़ौज को लेकर आजकल पहले के मुक़ाबले ज़्यादा मुखर हैं.

दूसरी वजह ये भी है कि नवाज़ शरीफ़ अब इस बात को जानते हैं कि उनके ख़िलाफ़ पाकिस्तान में जो मामले चल रहे हैं, वो निकट भविष्य में वापस होने वाले नहीं. इसलिए भी नवाज़ अब आर-पार के मूड में हैं.

नवाज़ शरीफ़ भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं, लेकिन इन दिनों अपनी ख़राब सेहत का इलाज कराने के लिए वो लंदन में हैं.

नवाज़ शरीफ़

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नदीम रज़ा कहते हैं कि फ़ौज पर अटैक कर नवाज़ भ्रष्टाचार के आरोपों के ख़िलाफ़ एक काउंटर नैरेटिव तैयार कर रहे हैं. उनका कहना है कि देश में महँगाई, भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की उनकी ये कोशिश हैं.

लेकिन क्या फ़ौज के ख़िलाफ़ उनके खुल कर बोलने के रुख़ का पीडीएम की बाक़ी पार्टियाँ समर्थन करती हैं?

इस सवाल के जवाब में नदीम रज़ा कहते हैं, “जिस स्तर पर जाकर नवाज़ शरीफ़ फ़ौज के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं, उस स्तर की बात बाक़ी पार्टियाँ नहीं कर रही हैं. पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ज़रदारी का एक बयान भी आया था कि नाम लेकर किसी की निंदा नहीं की जानी चाहिए. जमीयतुल-उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई-एफ़) के अध्यक्ष मौलाना फ़ज़लुर्रहमान, फ़ौज की निंदा करते हैं, लेकिन राजनैतिक दायरे में रह कर. वे बातों-बातों में अपना पक्ष भी रख देते हैं लेकिन उससे फ़ौज से नाराज़गी भी ज़ाहिर नहीं होती. कुल मिला कर बाक़ी पार्टियाँ सियासत ज़रूर कर रही हैं, लेकिन विरोध नहीं कर रहीं.

इमरान ख़ान और बाजवा

फ़ौज से नवाज़ शरीफ़ के रिश्ते

2018 में पाकिस्तान के अख़बार ‘डॉन’ को नवाज़ शरीफ़ ने चुनाव से पहले एक इंटरव्यू दिया था. उस वक़्त पाकिस्तान के शहरी इलाक़ों के एक बड़े हिस्से में डॉन अख़बार पर कथित तौर पर रोक लग गई थी.

दरअसल उस इंटरव्यू में नवाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तानी चरमपंथियों को सीमा पार मुंबई जाकर 150 लोगों की हत्या करने की ‘इजाज़त’ देने के फ़ैसले पर सवाल उठाए थे. नवाज़ शरीफ़ ने इस इंटरव्यू में पूछा कि आख़िर पाकिस्तान ने साल 2008 के मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड पर क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की.

पाकिस्तान की सरकार ने हालाँकि ये स्पष्ट किया था कि अख़बार पर रोक लगाने का कोई भी सरकारी आदेश नहीं दिया गया, इसलिए सबका ध्यान फ़ौज की तरफ़ चला गया. जिन इलाक़ों में अख़बार पर रोक लगी, वो फ़ौज के नियंत्रण वाले इलाक़े थे.

लेकिन ऐसा नहीं कि नवाज़ शरीफ़ के रिश्ते हमेशा से फ़ौज के साथ ख़राब रहे हों.

तीन बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज़ शरीफ़ फ़ौज के शुरुआती दोस्तों में से हैं. राजनीति से फ़ौज के गठजोड़ के वे अगुवा रहे हैं. फ़ौज के लिए धुर दक्षिणपंथी गुटों और संगठनों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाने का सेहरा नवाज़ शरीफ के सिर ही बांधा जाता है.

नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी

बहुत से लोगों का कहना है कि साल 1988 में जनरल ज़िया की एक हवाई दुर्घटना में मौत के ठीक बाद आईएसआई के एक पूर्व चीफ़ की मदद से ही नवाज़ शरीफ़ ऐसा करने में कामयाब हो पाए थे.

पाकिस्तान ये कहता रहा है कि कारगिल को कश्मीरी चरमपंथियों ने अंजाम दिया था, लेकिन बाद में ये बात सामने आई कि उसकी फ़ौज ने ये साज़िश रची थी. नवाज़ शरीफ़ पहले भी ये कह चुके हैं कि इस लड़ाई के लिए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ज़िम्मेदार थे लेकिन अभी तक उन्होंने पूरी कहानी नहीं बताई है.

1999 में कारगिल की पहाड़ियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी. इसकी शुरुआत तब हुई जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की ऊँची पहाड़ियों पर घुसपैठ करके अपने ठिकाने बना लिए थे. इस लड़ाई में भारत उन पहाड़ियों पर ठिकाना बनाने वाले पाकिस्तानी सैनिकों को आख़िरकार वहां से हटाने और उस जगह पर दोबारा क़ब्ज़ा जमाने में कामयाब रहा था. उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ थे.

इस बार क्वेटा की रैली में नवाज़ शरीफ़ कारगिल पर थोड़ा आगे की बात कह गए.

पाकिस्तान में कई विश्लेषकों का ये मानना है कि भारत के साथ संबंध सामान्य करने की नवाज़ शरीफ़ की कोशिशों पर पानी फेरने के लिए कारगिल की लड़ाई छेड़ी गई थी. जनरल मुशर्रफ़ के साथ नवाज़ शरीफ़ का तनाव इस क़दर बढ़ गया था कि फ़ौज ने उनकी सरकार का तख़्तापलट कर दिया और वे निर्वासित कर दिए गए.

नवाज़ शरीफ़ को इस बात का दर्द आज तक है.

पाकिस्तान

फ़ौज पर सवाल और रैलियों में भीड़

पार्टी नेता मोहम्मद ज़ुबैर और फ़ौज प्रमुख की बातचीत को सरेआम उजागर करके, पाकिस्तानी फ़ौज ने नवाज़ शरीफ़ के वही पुराने जख़्म हरे कर दिए हैं.

इसमें एक बात और ग़ौर करने वाली है. चाहे 25 अक्तूबर की क्वेटा रैली हो या 16 अक्तूबर को पंजाब के गुजरानवाला में या फिर 18 अक्तूबर को कराची की रैली- तीनों में भीड़ ख़ूब जुटी. ऐसे में क्या नवाज़ शरीफ़ फ़ौज पर जो बोल रहे हैं, उसे पाकिस्तान की जनता भी सही मान रही है और क्या इसी वजह से उनकी रैलियों में भीड़ भी जुट रही है?

इस पर हारून कहते हैं, “पाकिस्तान में ये एक नया ख़तरनाक ट्रेंड शुरू हो गया है. पहले फ़ौज पर बोलने से हर कोई बचता था. लेकिन अब सोशल मीडिया पर हर कोई फ़ौज के ख़िलाफ़ लिख रहा है. इस तरह से फ़ौज के ख़िलाफ़ सेंटीमेंट पहले पाकिस्तान में कभी देखने को नहीं मिला. इसके पीछे की एक वजह ये भी है कि फ़ौज राजनीतिक मुद्दों में ख़ुद शामिल भी हो रही है. फ़ौज को भी राजनीति से दूर रहने की ज़रूरत है और उसे इस बात का अहसास है. इसलिए सोशल मीडिया पर आए दिन #स्डैंडविदआर्मी भी ट्रेंड होता रहता है.”

लेकिन भीड़ जुटने की बात पर वरिष्ठ पत्रकार नदीम रज़ा कहते हैं, “भीड़ से आप अंदाज़ा न लगाएँ की पाकिस्तानी अवाम नवाज़ शरीफ़ की बात से इत्तेफ़ाक़ रखती है. भारत में काँग्रेस की रैलियों में भीड़ जुटती है, लेकिन क्या चुनाव में उन्होंने वो वोट हासिल किए? नहीं किए न? पीडीएम 11 पार्टियों का समूह है. अगर हर पार्टी 10 हज़ार लोगों को भी ले आए, तो भीड़ तो जुट ही जाएगी. भीड़ का दूसरा मतलब ये भी है कि सरकार ‘सहनशील’ है, तभी इन रैलियों का आयोजन हो पा रहा है. अगर फ़ौज पर लगाए जा रहे आरोपों में वाक़ई में सच्चाई होती तो ये रैलियाँ होती ही नहीं.”

वजह चाहे जो भी हो, लेकिन सेना और सरकार में नवाज़ शरीफ़ के ताज़ा बयानों की वजह से थोड़ी बेचैनी ज़रूर है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here